आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और शिक्षा में ज्ञान-मीमांसा का बदलता स्वरूप: संभावनाएँ, चुनौतियाँ और मानव-केंद्रित शैक्षिक दृष्टि
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, विशेषकर जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ने शिक्षा में ज्ञान के निर्माण, प्रस्तुतीकरण, सत्यापन और प्रसार की पारंपरिक प्रक्रियाओं को गहराई से प्रभावित किया है। पहले ज्ञान का प्रमुख आधार शिक्षक, पुस्तक, अनुभव, संवाद और संस्थागत रूप से प्रमाणित स्रोत होते थे, जबकि वर्तमान समय में एल्गोरिदम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियाँ भी ज्ञान के मध्यस्थ के रूप में कार्य कर रही हैं। इस परिवर्तन ने ज्ञान-मीमांसा से जुड़े अनेक प्रश्न उत्पन्न किए हैं—ज्ञान का वास्तविक स्रोत कौन है, किसी सूचना को सत्य मानने का आधार क्या होना चाहिए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा प्रस्तुत उत्तरों की प्रामाणिकता कैसे निर्धारित की जाए तथा ज्ञान-निर्माण में मनुष्य की भूमिका क्या रहेगी? प्रस्तुत शोध आलेख में शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संबंध का ज्ञान-मीमांसात्मक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। अध्ययन वैचारिक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है तथा इसमें संबंधित दार्शनिक, शैक्षिक और तकनीकी साहित्य का विवेचन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को ज्ञान का अंतिम प्राधिकारी मानना उचित नहीं है। इसे सहायक ज्ञान-संसाधन के रूप में प्रयोग करते हुए मानवीय विवेक, नैतिक निर्णय, आलोचनात्मक चिंतन, स्रोत-सत्यापन और ज्ञान-मीमांसात्मक स्वायत्तता को शिक्षा के केंद्र में बनाए रखना आवश्यक है।
