भारतीय शिक्षा व्यवस्था के दार्शनिक आधार, उद्देश्यों एवं शिक्षण-पद्धतियों का ऐतिहासिक एवं दार्शनिक विश्लेषण तथा वर्तमान शिक्षा में उनकी प्रासंगिकता

लेखक

  • प्रदीप कुमार मिश्रा शोध छात्र ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.68677/amij.v1i2.06

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प्राचीन भारतीय शिक्षा, दार्शनिक आधार, गुरु-शिष्य परंपरा, शिक्षण-पद्धति, मूल्यपरक शिक्षा, समग्र विकास।

सार

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था भारतीय ज्ञान-परंपरा, दार्शनिक चिंतन, नैतिक मूल्यों तथा व्यक्तित्व के समग्र विकास पर आधारित थी। इसका उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन अथवा आजीविका प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक विकास को प्रोत्साहित करना भी था। उपनिषदों की ज्ञान-दृष्टि, बौद्ध दर्शन की अनुभवपरकता, जैन दर्शन का अहिंसा एवं अनेकांतवाद तथा न्याय दर्शन की तर्कपरकता ने भारतीय शैक्षिक चिंतन को विविध आयाम प्रदान किए। श्रवण, मनन, निदिध्यासन, संवाद, प्रश्नोत्तर, वाद-विवाद, स्वाध्याय एवं गुरु-शिष्य परंपरा इसकी प्रमुख शिक्षण-पद्धतियों में सम्मिलित थीं।

प्रस्तुत अध्ययन में प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था के दार्शनिक आधारों, उद्देश्यों एवं शिक्षण-पद्धतियों का ऐतिहासिक तथा दार्शनिक विश्लेषण करते हुए उनकी वर्तमान शिक्षा में प्रासंगिकता का विवेचन किया गया है। अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि प्राचीन परंपराओं के उपयोगी तत्त्वों को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता तथा समावेशी शिक्षा के साथ समन्वित करके शिक्षा को अधिक मानवीय, मूल्यपरक एवं जीवनोपयोगी बनाया जा सकता है।

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प्रकाशित

2026-09-30

अंक

खंड

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